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रोग तथा आरोग्य के कारण

rog tatha aarogy ke karan

काल अर्थात समय या मौसम, अर्थ – जिसे ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकता है और कर्म – मन, वाणी और शारीर की प्रवृति या चेष्टा – इन तीनो के हीन योग, अति योग और मिथ्या योग से ही रोगों की उत्पत्ति होती है. इन तीनो का सम्यक योग स्वास्थ रहने का कारण है. 

आयुर्वेद की दृष्टि में काल तीन प्रकार का है इसे आप मौसम भी कह सकते है – शीत काल, उष्ण काल और वर्षा काल. इन्ही कालों के समूह को वर्ष, वत्सर या संवत्सर भी कहते हैं. शीत, उष्ण और वर्षा का अधिक होना अतियोग है, कम होना हीनयोग है और अपनी सीमा के विपरीत होना मिथ्यायोग है. 

जिन विषयों को आप अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ग्रहण कर सकते हैं वाही अर्थ है. अर्थों का इन्द्रियों के साथ अधिक संयोग अतियोग है, कम संयोग होना हीनयोग है और अनिष्टकारी संयोग होना मिथ्या योग है. 

शारीर, मन और वाणी के प्रयास को कर्म कहते है. अधिक कर्म अतियोग है, कर्म की कमी हीनयोग है और हानिकारक कर्म को अनिष्टयोग कहते हैं. 

किसी भी रोग की उत्पत्ति का कारण काल, अर्थ और कर्म का अधिक, कम या अनिष्टकारी होना है. इसके आलावा जो समुचित योग है उसे सम्यग्योग कहा गया है. सम्यग्योग आरोग्य का या स्वास्थ्य का आधार है. 

रोग और आरोग्य में भेद 

जब वात, पित्त और कफ सम न होकर विषम अवस्था में हों तो ये रोग उत्पन्न करता है और जब ये सामान अवस्था में हों तो शारीर स्वास्थ रहता है.  रोग दो प्रकार के हो सकते हैं – १. जो वात, पित्त और कफ की विषमता से हो – ये निजी या आंतरिक रोग के जाते हैं. २. अभिघात या किसी भी बाहरी कारणों से होने वाले रोगों को आगंतुज़ कहा गया है. रोगों के दो आश्रयस्थान हैं – काय या शारीर और मन. ज्वर, रक्तपित्त, कास, स्वास आदि काय रोग हैं और मद, मूरछा, सन्यास, राग-द्वेष आदि मानसिक रोग हैं.

मानस या मन के दो दोष हैं – रजोगुण और तमोगुण. ये दोनों गुण एक साथ ही रहते हैं. सत्वगुण निर्विकार है और मानसिक स्वास्थ का कारण है. सत्वं = अस्तित्व युक्त. राजस = राग या आसक्ति युक्त और तामस = विनाशकारक प्रधान गुण होता है. 

देखकर, हाथ से छुकर और रोग के विषय में अलग-अलग प्रश्न पूछ कर रोगी की परीक्षा की जा सकती है. रोगी की परीक्षा में आधुनिक उपकरणों का भी प्रयोग किया जा सकता है. रोगज्ञान के उपाय – निदान, लक्षण, पूर्वरूप, उपशय तथा संप्राप्ति से रोग की परीक्षा की जानी चाहिए. 

देश्भेदों का वर्णन 

आयुर्वेद में – भूमिदेश और देह्देश – ये दो प्रकारों के देश का वर्णन है. शारीर के विभिन्न अवयवों को देह्देश कहा गया है. भूमि देश तीन प्रकार के हैं – जंगल देश – यहाँ हवा अधिक चलती है. आनुप देश यहाँ कफ दोष प्रधान होता है और साधारण प्रदेश – इस देश में तीनो दोष सामान अवस्था में रहते हैं. जंगल देश में पित्तज, रक्तज और वातज रोग अधिक होते है. ये प्रदेश सूखे प्रदेश हैं जैसे बीकानेर, जैसलमेर आदि. आनुप देश में जल पहाड़ आदि अधिक होते हैं और यहाँ कफज और वातज रोग अधिक होते हैं. साधारण प्रदेश में तीनो दोष समुचित मात्र में होने के कारण यहाँ के निवासी अधिक स्वास्थ होते हैं जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि. 

काल के भेद

आयुर्वेद में काल दो प्रकार का है – १. क्षण – प्रातः काल और सायं काल. २. रोग की अवस्था (आमावस्था और जीर्णावस्था). इन दोनों के अनुसार ही चिकित्सा की जानी चाहिए. 

औषध के भेद 

१. वामन-विरेचन आदि विधियों से रोग को निकलना शोधन कहलाता है और २. बढे हुए दोषों को शांत करने को शमन कहते हैं. वात दोष की चिकत्सा में बस्ती-प्रयोग, पित्त दोष की चिकत्सा में विरेचन प्रयोग और कफ दोष की चिकत्सा में वमन-प्रयोग है. वात दोष में तैल, पित्त दोष में घृत और कफ दोष में मधु का प्रयोग उचित शमन चिकत्सा है. 

बुद्धि तथा धैर्य से व्यवहार करना और आत्मादी विज्ञान ( कौन मेरा है, क्या मेरा बल है आदि) का विचार कार्य करना मानसिक दोषों की उत्तम चिकत्सा है. 

चिकित्सा के चार पाद 

  1. वैध्य या चिकत्सक – चिकत्सक को कुशल, ज्ञानी, जिसने चिकत्सा की विधियों को अनेक बार परखा हो और शारीर तथा आचरण से पवित्र होना चाहिए.
  2. द्रव्य या औषधि – औषधि ऐसी हो जो कई रूपों में दी जा सके, जो औषधि के सभी गुणों से परिपूर्ण हो, गुणों की संपत्ति से संपन्न हो और रोगी, देश-काल के अनुरूप हो. 
  3. परिचारक – रोगी से स्नेह रखने वाला, शुद्ध या साफ़-सुथरा हो, कुशल हो और बुद्धिमान हो. 
  4. रोगी – रोगी के पास धन आदि हो, चिकत्सक के परामर्श के अनुसार आचरण करने वाला हो, अपने सुख-दुःख कह सके और चिकत्सा काल के कष्टों से ना घबराये, ऐसा हो. 

चिकत्सा के चार पादों में चिकत्सक प्रधान होता है. बाल रोगी अपने बात को ठीक प्रकार से कह नहीं सकता इसलिए चिकत्सक को उसे समझना चाहिए. 

रोगों के भेद 

  1. साध्य – १. सुख साध्य और २. कष्ट साध्य. 
  2. असाध्य – १. कुछ दिन चिकत्सा द्वारा चलने योग्य और २. जवाब देकर चिकत्सा करने योग्य. 
  3. जो रोग उचित चिकत्सा करने से और पथ्य सेवन करते रहने से शांत रहते है उन्हें याप्य रोग कहा जाता है. 
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दोषधातुमलमुलं ही शरीरम्

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आयुर्वेद शास्त्र में तीन ही दोष माने जाते हैं – 

  • वात
  • पित्त तथा
  • कफ

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश – इन पांच महाभूतों से हमारा ये शारीर बना है और इसके अलावा छटी धातु चेतना (चेतना का आधार मन सहित आत्मा) कहा गया है. यही चिकित्सकीय पुरुष है. 

पंचमहाभूतों में आकाश तत्व खाली स्थान के रूप में तथा पृथ्वी तत्व आधार स्वरुप है इसलिए ये दोनों निष्क्रिय हैं. इन दोनों में किसी प्रकार की कोई क्रिया नहीं होती. जल तत्व कफ है, अग्नि तत्व पित्त है और वायु तत्व ही वात है. 

आयुर्वेद शास्त्र में प्राणी मात्र का नाम पुरुष है. 

ये तीनो दोष यदि बढ़ जाएँ अथवा घट जाएँ तो स्वास्थ को हानि पहुंचाते हैं और अगर सम मात्रा में हों तो स्वास्थ ठीक रहता है. 

दोषों का अपना स्वाभाव क्या है यह कहना कठिन है क्यूंकि ये पुरुष के आहार-विहार और ऋतू परिवर्तन आदि पर भी निर्भर हैं. वात, पित्त और कफ केवल दोष ही नहीं हैं, इन्हें धातु और मल भी कहा गया है. जब ये शारीर को रोगी करते हैं तो दोष कहे जाते हैं, जब मानव को स्वस्थ रखते हैं तब धातु और जब मलिन करते हैं तब मल कहे जाते हैं. 

ये तीनो वात आदि दोष पुरे शारीर में व्याप्त रहते हैं पर नाभि से नीचे वात का, नाभि से हृदय का मध्य भाग पित्त का और हृदय से ऊपर कफ का आश्रय स्थान है. 

अवस्था का अंतिम भाग- वृधावस्था, दिन का अंतिम भाग २-६ बजे, रात्रि का अंतिम भाग २-६ बजे और अन्न के पचने का अंतिम भाग वायु अथवा वात के प्रकोप का होता है. अवस्था का मध्य भाग – युवावस्था, दिन का मध्य भाग १०-२ बजे, रात्रि का मध्य भाग १०-२ बजे और अन्न के पचने का मध्य भाग पित्त के प्रकोप का होता है. अवस्था का आदि भाग – बाल्यावस्था, दिन का प्रथम भाग ६-१० बज, रात्रि का प्रथम भाग ६-१० बजे और भोजन पचने का प्रथम भाग कफ के प्रकोप का होता है. 

वात दोष के प्रभाव से जठराग्नि विषम, पित्त दोष के प्रभाव से तीक्ष्ण और कफ दोष के प्रभाव से मंद हो जाती है.

आमाशय, पक्वाशय, अग्नान्य्शय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय, उन्डूक तथा फुफ्फुस – इन अवयवों की परिधि को आयुर्वेद में कोष्ठ कहा गया है. कोष्ठ वात के प्रभाव से क्रूर, पित्त दोष से मृदु और कफ दोष से माध्यम रहता है, और तीनो दोषों के सामान होने पर भी माध्यम रहता है. 

वात दोष की अधिकता से गर्भ की हीन प्रकृति, पित्त दोष की अधिकता से माध्यम प्रकृति और कफ दोष की अधिकता से उत्तम प्रकृति बनती है. यही सबमे श्रेष्ट मानी गई है. जो प्रकृति दो-दो दोषों के मिश्रण से बनती है वे निंदनीय मानी गई हैं, और सम्धातुज प्रकृति सबमे श्रेष्ठ मानी गई है. 

दोषों के आधार पर पुरुष प्रकृति को सात भागों में विभाजित किया जाता है –

  • वात प्रकृति हीन
  • पित्त प्रकृति मध्य
  • कफ प्रकृति उत्तम 
  • सम धातु प्रकृति सबमे उत्तम
  • वात पित्त प्रकृति, वात कफ प्रकृति तथा पित्त कफ प्रकृति – ये तीनो निन्दित हैं. 

वात दोष के गुण – यह रुक्ष, लघु, शीत, खर, सूक्ष्म तथा चल (सदा गतिशील) होता है.

पित्त दोष के गुण – यह कुछ स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण, लघु, विस्र (आम गंध वाला), सर तथा द्रव होता है. 

कफ दोष के गुण – यह स्निग्ध, शीत, गुरु, मंद, श्लक्षण, मृत्स्न तथा स्थिर होता है.

आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार किन्ही दो-दो दोषों के क्षय या वृद्धि को संसर्ग कहते हैं और तीनो दोषों के एक साथ क्षय या वृद्धि को सन्निपात कहते हैं.

धातुओं का वर्णन –

आयुर्वेद में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र – ये सात धातु कहे जाते हैं और जब वात आदि दोष इन्हें दूषित करते हैं तो इन्हें दुष्य कहते हैं.

मलों का वर्णन –

मूत्र, पुरीष, स्वेद (पसीना) आदि मल कहे जाते हैं. मुत्रादी मल भी दुष्य कहे गए हैं क्यूंकि वात आदि दोष इन्हें भी दूषित करते हैं.

ऊपर कहे गए वात आदि दोष, रस आदि धातु और मलों के सामान गुणों वाले पदार्थों के सेवन से इनमे वृद्धि होती है और इनके विपरीत गुणों वाले पदार्थों के सेवन से इनका क्षय होता है. दोष धातुओं और मलों का उचित प्रकार से बढ़ना और कम होना स्वास्थ्य में वृद्धि करता है और इनके अनुचित प्रकार से बढ़ने और कम होने से स्वास्थ्य में हानि होती है. बढे हुए दोष, धातु और मलों को घटा कर सम करना और घटे हुए दोष, धातु और मलों को बाधा कर सम करना ही चिकित्सा का क्रम होना चाहिए.

रसनाअर्थो रस:

अर्थात जो रसना (जीभ) का विषय है उसे रस कहा जाता है. आयुर्वेद में रसों की संख्या ६ है – १. स्वादु (मीठा), २. अम्ल (खट्टा), ३. लवण (नमकीन), ४. तिक्त ( नीम चिरायता आदि), ५. उषण (कटु – काली मिर्च आदि) और ६. कषाय (कसैला – हरीतकी आदि). ये रस भिन्न भिन्न पदार्थों में पाए जाते हैं और अंत से आगे की ओर बलवर्धक होते हैं, अर्थात मीठा सबसे अधिक बलवर्धक होता है. मधुर, अम्ल और लवण रस वात दोष को नष्ट करते हैं. तिक्त, कटु और कषाय रस कफ दोष को नष्ट करते हैं. कषाय, तिक्त और मधुर रस पित्त दोष को नष्ट करते हैं. इसके विपरीत रस वात, पित्त और कफ दोषों को बढ़ाते हैं.

मधुर, अम्ल और लवण रस वात दोष को नष्ट करते हैं. तिक्त, कटु और कषाय रस कफ दोष को नष्ट करते हैं. कषाय, तिक्त और मधुर रस पित्त दोष को नष्ट करते हैं. इसके विपरीत रस वात, कफ और पित्त दोष को बढ़ाते हैं. 

द्रव्य का वर्णन 

विधि भेद से द्रव्य तीन प्रकार के होते हैं – 

  • शमन ( वात आदि दोषों का शमन करने वाला)
  • कोपन ( वात आदि दोषों को बढ़ने वाला)
  • स्वास्थहित (स्वास्थ पुरुष के स्वास्थ्य को बनाये रखने वाला)

ये द्रव्य पससपर विपरीत गुणों वाले होते हैं. जो द्रव्य शमन होता है, वह उस दोष का कोपन नहीं करता अर्थात बढ़ता नहीं है, और जो कोपन होता है वो उस दोष को शांत नहीं करता. 

शमन द्रव्य – जैसे – तैल, घृत और मधु. तैल स्निग्ध, उष्ण और गुरु गुणवाला होने के कारण वात दोष का शमन करता है क्यूंकि ये उससे विपरीत गुण वाला होता है. घृत मधुर, शीत और मंद गुण वाला होने के कारण पित्त दोष का शमन करता है. मधु – रुक्ष, तीक्ष्ण और कषाय गुण वाला होने के कारण विपरीत गुण वाले कफ दोष को नष्ट करता है. 

कोपन द्रव्य – जो द्रव्य, वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं और मूत्र आदि मलों को कुपित करता है. जैसे – यवक, पाटल, माष (उड़द), मछली, आममुलक, सरसों का तेल, मंदक, दधि आदि. 

विरुद्ध पधार्थ जैसे दूध और मछली का एक साथ सेवन करना. 

वीर्य का वर्णन 

द्रव्यों में शीत गुण और उष्ण गुण की अधिकता के आधार पर दो प्रकार का ‘वीर्य’ माना जाता है. द्रव्यों की कर्म शक्ति को ही वीर्य कहते हैं. 

वीपाक का वर्णन 

कोई भी द्रव्य चाहे किसी भी रस से युक्त क्यों न हो उसका विपाक तीन प्रकार का होता है – मधुर, अम्ल तथा कटु.

रस का ज्ञान जीभ के स्पर्श से, विपाक का ज्ञान उसके कार्य को देखकर और वीर्य का ज्ञान प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों से होता है. 

द्रव्यों के गुण 

द्रव्यों में पाए जाने वाले परस्पर विपरीत २० गुण इस प्रकार हैं – 

  • गुरु = भारी
  • लघु = हल्का
  • मंद = चिरकारी – ये शीघ्र लाभ या हानि नहीं करता 
  • तीक्ष्ण = तीखा – शीघ्र लाभ या हानि करता है 
  • शीत = शीतल
  • उष्ण = गरम
  • स्निग्ध = चिकना
  • रुक्ष = रुखा 
  • क्ष्लक्षण = साफ़
  • खर = खुरदुरा 
  • सान्द्र = गाढ़ा
  • द्रव = पतला
  • मृदु = कोमल
  • कठिन = कठोर
  • स्थिर = अचल 
  • सर = चल – फैलने वाला, जो गतिशील हो 
  • सूक्ष्म = बारीक – छोटे से छोटे स्रोतों में प्रवेश करने वाला 
  • स्थूल = मोटा
  • विषद = टूटने वाला 
  • पिच्छिल = लसीला – लुआबदार
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आयु की कामना करने वालों के लिए हितकर

राग आदि रोग मानव के पीछे लगे रहते हैं. ये पुरे शारीर में फैले रहते हैं और उत्सुकता, मोह और बेचैनी उत्पन्न करते हैं. राग, द्वेष, क्रोध, लोभ आदि को मानसिक रोग कहा गया है. मानसिक रोगों में मन का आधार देह है, इसलिए ये मन के साथ-साथ देह को भी पीड़ित करते हैं. जिन पुरुष और स्त्रियों का चित्त शुद्ध होता है उनको ये मानसिक रोग पीड़ा नहीं पहुंचाते. 

जब मानव इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों को ग्रहण करने की चिंता करता है तो उसके वास्तविक मार्ग में रूकावट आती है – इसे राग या रजोगुण कहते हैं. राग से कामवासना का उदय होता है असफलता मिलने पर क्रोध आता है, क्रोध के कारण भ्रम पैदा होता है जिससे बुधि का विनाश होता है और बुधि के विनाश से लोक और परलोक दोनों का विनाश हो जाता है. ये है रागादी रोगों का विनाश क्रम!

जो मनुष्य थोड़ी सी भी धर्मसंहिता को पढ़ कर धर्म के अनुसार आचरण करता है और अपने चित्त को शुद्ध रखते हुए रागादी रोगों से बचा रहता है उसका लोक और परलोक दोनों में ही कल्याण होता है.

धर्म, अर्थ और सुख – इन तीन पुरुषार्थों को प्राप्त करने का साधन आयु है, इसलिए आयु या सुखायु की कामना करने वाले मनुष्य को आयुर्वेद में दिए निर्देशों का आदर करना चाहिए. 

आयुर्वेद वह शाश्त्र है जिसमे आयु, सुख आयु, दुःख आयु तथा अहित आयु का वर्णन है और आयु के हित और अहित के लिए आहार-विहार और औशाधियौं का वर्णन है. 

जिससे लोक का धारण पोषण होता है वह धर्म है. जिसे समाज प्राप्त करना चाहता है वह अर्थ है. सुख दो प्रकार का होता है – एक – जिससे तत्काल सुख प्रतीत होता है और दूसरा – जो आने वाले समय को भी सुखमय बनता है. 

ऐसी मान्यता है की सबसे पहले ब्रह्मा जी ने आयुर्वेद का स्मरण करके प्रजापति दक्ष को प्रदान किया, प्रजापति दक्ष ने इसे अश्वनी कुमारों को पढाया, अश्वनी कुमारों ने इंद्र को पढाया, इंद्र ने अत्रिपुत्र आदि मह्रिषियों को पढाया, आत्रेय आदि ने अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, हारित, क्षारपाणी आदि को पढाया और फिर इन मह्रिषियों ने अलग अलग तंत्रों की विस्तार से रचना की. 

आयुर्वेद के आठ अंग हैं – 

  • कायचिकित्सा – इसी में सम्पूर्ण शारीर को पीड़ित करने वाले आमाशय और पक्वाशय से उत्पन्न ज्वर आदि रोगों की चिकित्सा की जाती है.
  • बालतंत्र – बालकों के शारीर में परिपूर्ण बल और धातुओं का आभाव होता है इसलिए इसका स्वतंत्र वर्णन किया गया है. 
  • गृहचिकित्सा – इस विषय का आज कोई प्राचीन स्वतंत्र तंत्र उपलब्ध नहीं है. 
  • उर्धवांगचिकित्सा – आँख, मुख, कान और नासिका में आधारित रोगों की चिकित्सा ही इस अंग का प्रधान क्षेत्र है.  
  • शल्यचिकित्सा – आयुर्वेद के आठों तंत्रों में यही तंत्र प्रधान है. मूलतः शल्यतंत्र में यंत्र, शाश्त्र, क्षार, अग्नि के प्रयोगों का निर्देश मिलता है. 
  • दंस्ट्राविषचिकित्सा – इसमें विष आदि के लक्षण और उनकी शांति के उपायों का वर्णन मिलता है. 
  • जराचिकत्सा या रसायनतंत्र उसे कहा गया है जो यौवन को कुछ समय के लिए पुनः स्थापित करता है. 
  • वृषचिकित्सा या वाजीकरणतंत्र में वीर्य को बढाने और मैथुन क्रिया को सुखकर और सुगम बनाने के विषय में वर्णन है. 

सावधान – रसायन एवम वाजीकरण प्रयोगों का उपयोग केवल चिकित्सा के लिए ही होना चाहिए दुराचार के लिए इनका प्रयोग ना करें एवम किसी योग्य चिकित्सक की देखरेख में ही इसका प्रयोग करें.

रोग या रोगों की शांति के लिए जो भी उपाय चिकित्सक करता है उसे ही चिकित्सा कहा जाता है. उचित चिकित्स के लिए आवश्यक है की चिकित्सक, औषधि, परिचारक तथा रोगी उचित गुणों वाले हों तभी सही चिकित्सा संभव है. 

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The Four Golden Rules Of Ayurveda

The four golden rules of ayurvedaAs per the ancient Indian system of medicine – The Ayurveda, our body is a balance of three doshas, namely – vata, pitta and kapha. If these doshas go out of balance, the disease arrives. When the vata goes out of balance, you get over 80 diseases. When the pitta goes out of balance you get approximately 46-50 diseases, and when kapha goes out of balance you get approximately 28 diseases. And if all these three go out of balance you get 148 diseases.

There have been many great ancient ayurvedic physicians in India and among them Rishi Bagh Bhatt, has written two books with approximately 7000 sutras on Ayurveda. Rishi Bagh Bhatt was the disciple of Charaka Rishi. As per Rishi Bagh Bhatt 85% of the times when you are not well, you do not need a doctor, only 15% of the diseases require the care and attention of a qualified physician.

Out of the many golden rules to live a healthy life, if you can follow the following four, you will be able to keep the three doshas in harmony and balance. I am personally following these rules for some time now and find a definite improvement in my wellbeing.

The first golden rule is  not to drink water immediately before or after eating food. Drink water 45 minutes before eating the food and after 1 hour of eating the food. The reason is very simple, if you drink water immediately before or after eating the food, it dilutes the gastric juices and the food is not digested properly resulting in a lot of diseases, gastric discomfort like acidity to start with. It is good to drink fruit juices after food in the morning, butter milk or curd in the afternoon and milk at night. So this is the first golden rule to keep healthy. Simple.

The second golden rule is to drink water sip by sip. Do not drink a glass full of water in one go. The simple reason behind is that when you drink water slowly, the saliva gets into our stomach and keeps the acidity in control. Because when the acidity increases, it results many diseases.

The third golden rule is not to drink cold and worse chilled water. At the most when you need to drink cold water, drink from an earthen pot or matka or ghada. Never drink water from the freezer. This lowers the body temperature and brings down the efficiency of the various reactions going on, as our body is created to work at a specific temperature.

The fourth golden rule is to drink water, 2-3 glasses or more early in the morning on an empty stomach and before brushing your teeth. The acidity is very high in the morning in our stomach, and when you drink water the first thing in the morning, the saliva that goes with it helps to calm down the acidity. The water also helps to build pressure in the large intestine and help relieve constipation.

These four golden rules will help you maintain the three doshas – vata, pitta and kapha in harmony and balance and live a healthy life.

 

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Authentic Ayurveda!

Authentic AyurvedaIn a world where taking advantage of everything is fast becoming a norm, we are a group of people who still believe in the age old principle of serving and connecting people. We are a group of people who still believe that intention matters more than intelligence.
We are a group of people who still believe in the principle of “Vasudhaiva Kutumbakam” that “the world is one family” and for me to live better, the whole world needs to become and we have come together to spread the same message with the help of an age old science that has been unquestioned for the last 5500 years i.e Ayurveda. Ayurveda has been standing tall because it is not only the work of super intellectual people but also of the people who had just one intention of serving the mankind. This is what makes our faith in Ayurveda unshakable and helps us in adopting Ayurveda in true spirits. Our faith and passion guides us in developing unique and patented products that are in line with the law of nature and that is why our products deliver the results that no one else can even dare to dream.