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रोगानुत्पादनिय अध्याय अष्टांगहृदयं

आयुर्वेद १

रोगानुत्पादनिय अष्टांगहृदयं का चौथा अध्याय है. इसका अर्थ है रोगों की उत्पत्ति की रोकथाम. वो प्रयास जिसके कारण रोगों से बचा जा सके. आयुर्वेद में स्वास्थ्य की रक्षा को सर्वप्रथम महत्वपूर्ण माना गया है. अगर आप आहार-विहार आदि दिनचर्या और ऋतुचर्या का ध्यान रखें तो रोगों से बचे रहेंगे. और अगर रोग आते भी हैं तो उनका उचित उपचार यथाशीघ्र करना चाहिए, अन्यथा रोगों का उपचार कठिन हो जाता है और कभी-कभी अधिक उपेक्षा करने से रोग असाध्य भी हो जाते है.

अधार्णीय वेग

इसका अर्थ है शारीर के वेग जिनको धारण नहीं करना चाहिए, अर्थात रोकना नहीं चाहिए.

  • अपानवायु (पाद)
  • मल-मूत्र
  • छींक
  • प्यास
  • भूख
  • निद्रा
  • कास (कफ, खांसी)
  • श्रम्जनित स्वाष
  • ज्रिम्हा (जम्हाई)
  • आंसू
  • छरदी (वमन, उलटी करना)
  • शुक्र (semen)

इन सभी वेगों को रोकना नहीं चाहिए, क्यूंकि इन सब के जरिए शरीर में जो मल हैं वे बाहर निकलते हैं. अगर इनको रोकते हैं तो शरीर से मल आदि के न निकल पाने से शरीर में रोग पैदा होते हैं.

तेजी से जिसका प्रवाह हो उसे ही वेग कहते हैं. जैसे वेग से प्रवाहित नदी को रोकने से जल उचल कर ऊपर की ओर जाने लगता है, उसी प्रकार इन वेगों को रोकने से ये उलटी दिशा में बहने लगते है, इन्हें निकलना तो है ही, फिर ये जहाँ से निकलना चाहिए, वहां से न निकलकर कहीं और से निकलते हैं. और अगर न निकल पायें, तो शरीर को हानी पहुंचाते हैं. इसे ही उदावर्त – अर्थात – उल्टा घुमाव, रोग कहते हैं.

इसी लिए कहा गया है – ‘वेगान ना धारयेत’ – वेगों को धारण न करें, वेगों को ना रोकें.

अपानवायु को रोकने के दुष्परिणाम

उदावर्त, अपच, पेट में दर्द, अफरा, आँखों की रौशनी में कमी, कब्ज या मलबंध और ह्रदय सम्बन्धी रोग हो सकते हैं. ये समस्याएँ वायु के रुकने की वजह से होती हैं.

मल-मूत्र रोकन के दुष्परिणाम

पुरीष के वेग को रोकने से पिंडलियों की मस्पेशियों में दर्द, सर दर्द, बहती नाक, मुह की बदबू, वायु का उलटी दिशा में जाना, गुद्बलियों में कैंची के काटने जैसी पीड़ा, मुख से मल का निकलना आदि लक्षण होते हैं.

मूत्र के वेग को रोकने से अंग-अंग में टूटने जैसी पीड़ा, पथरी रोग का होना, मूत्राशय में, मूत्रमार्ग में, कूल्हों में, और गुर्दों में पीड़ा होना तथा अपानवायु और पुरीष के वेग को रोकने से होने वाले दुष्परिणाम भी हो सकते हैं.

अपानवायु, मल-मूत्र के वेग को रोकने से उत्पन्न स्थिति को नियंत्रित करना या उक्त रोगों की चिकित्सा

  • गुद्-मार्ग में मल प्रवर्तिनी वर्ती का प्रयोग करें (rectal and urethral suppositories)
  • उदर के ऊपर अभ्यंग कराएं
  • स्वेदन तथा बस्ती कर्म कराएं
  • ऐसा भोजन करें जो शुद्धिकरण में सहायक हो
  • मुत्र्वेग को रोकने से उत्पन्न रोगों में अवपिड़क धृत का सेवन करें अर्थात भोजन से पहले और पचने के बाद घी पियें. इस प्रकार दो बार सेवन किये गए घी को अवपिड़क कहते हैं.

उद्गार (डकार) वेग को रोकने के परिणाम

  • भोजन की इच्छा न होना
  • कंप-कपि का होना
  • ह्रदय एवं फुफुस की गति में रूकावट
  • अफरा, कास तथा हिचकी

छींक के वेग को रोकने से होने वाली हानि

  • सर में पीड़ा
  • कान आदि ज्ञानेन्द्रियों में दुर्बलता
  • मंयास्ताम्भ (गर्दन में अकडन)
  • अर्दित (मुख प्रदेश का लकवा)

इन रोगों की चिकित्सा तीक्ष्ण द्रव्यों के धुम्रपान से, तीक्ष्ण द्रव्यों से बनाये अंजन से, तीक्ष्ण द्रव्यों की नस्य से, सूर्य की ओर देखकर पुनः छींककर तथा स्नेहन तथा स्वेदन से करें.

तृषा वेग को रोकने से हानि

  • मुख का सुखना
  • शरीर की शिथिलता
  • बधिरापन
  • मोह, भ्रम तथा ह्रदय रोग की उत्पत्ति हो सकती है.

इस स्थिति में सभी प्रकार के आहार-विहार तथा शीत-चिकित्सा करनी चाहिए.

भूख के वेग को रोकने से हानि

  • शरीर में टूटने की सी पीड़ा
  • अरुचि
  • ग्लानी
  • कृशता का अनुभव होना
  • शूल तथा चक्कर आना

इस स्थिति में हल्का स्निग्ध (धृत युक्त या छोंका हुआ), गरम, थोडा रुचिकर भोजन देना चाहिए.

निद्रा वेग को रोकने से हानि

  • मोह (बेहोशी)
  • सर तथा आँखों में भारीपन
  • आलस्य
  • जम्भाई
  • अंगों में मसल देने जैसी पीड़ा होती है.

इस प्रकार के रोगी को भरपूर सोने दें तथा नींद आने तक उसके हात-पैर तथा सर को दबाना चाहिए.

कास वेग को रोकने से हानि

कास वेग को रोकने से कास रोग में वृद्धि, स्वाश रोग, अरुचि, ह्रदय रोग, शोष, हृध्मा आदि रोगों की उत्पत्ति हो सकती है. इसमें कास रोग चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करना चाहिए.

श्रम्स्वाश के वेग को रोकने से हानि

श्रम के कारण बढ़ी हुई सांस के वेग को रोकने से गुल्मरोग, ह्रदय सम्बन्धी रोग तथा मूर्च्छा रोग हो जाते हैं. इस स्थिति में विश्राम करना चाहिए और वात नाशक अभ्यंग आदि उपचार करने चाहिए.

जम्भाई के वेग को रोकने से हानि

  • सर में पीड़ा
  • कान आदि ज्ञान्नेद्रियों में कमजोरी
  • मन्यास्थाम्भ
  • अर्दित रोग

इन सभी रोगों की वात नाशक चिकित्सा करनी चाहिए.

अश्रु वेग को रोकने से हानि

  • पीनस (प्रतिश्याय)
  • नेत्र रोग
  • शिरोरोग
  • ह्रदय रोग
  • मान्यास्तम्भ
  • अरुचि
  • चक्करों का आना
  • गुल्म रोग

इन रोगों के हो जाने पर शयन करना, मध्य आदि का सेवन करना, मनोहर कथाएं सुनाना तथा समझाने-बुझाने वाली बातें करना हितकर होता है.

छरदी वेग को रोकने से हानि

  • विसर्प रोग
  • कोठ (चकते पड जाना)
  • कुष्ठ रोग
  • नेत्र रोग
  • कंडू (खुजली)
  • पांडू रोग
  • ज्वर
  • स्वास
  • जी मिचलाना
  • व्यंग
  • शोथ रोग

इन रोगों की चिकित्सा – गान्दूशधारण, धूमपान, उपवास, रुक्ष अन्नों का सेवन, भोजन करके तत्काल वमन करा देना, व्यायाम करना, विसर्प आदि में रक्त श्रावण कराएं, विरेचन कराएं तथा क्षार एवं नमक युक्त तेल के मालिश कराएं.

शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोग

  • मूत्र के साथ शुक्र का निकलना
  • लिंग, भग आदि में पीड़ा
  • सूजन हो जाना
  • ज्वर
  • ह्रदय में पीड़ा
  • मूत्र की प्रवृत्ति में रूकावट
  • अंग में टूटन की सी पीड़ा का होना
  • अंगड़ाईयों का आना
  • अंडवृद्धि
  • अश्मरी
  • नपुंसकता

ये रोग नर और नारी, दोनों में होते हैं. रोग की चिकित्सा के लिए मुर्गे का मांस, सूरा, शालीधान्य, उत्तरबस्ती, अभ्यंग (मालिश), अवगाहन, बस्ती शोधक मूत्र प्रवर्तक गोखरू आदि से पकाए गए दूध का तथा मैथुन क्रिया का सेवन करें.

धारण करने योग्य वेग

  • लोभ
  • इर्ष्या
  • मत्सरता
  • राग
  • द्वेष

इन वेगो को धारण करने से अर्थात रोकने से पुरुष (नर-नारी) इस लोक में तथा परलोक में भी सुख को प्राप्त होते हैं.

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आयुर्वेद के अनुसार ऋतुचर्या

Authentic Ayurveda

ऋतू का अर्थ होता है – मौसम और चर्या का अर्थ होता है – क्या करें और क्या न करें. अर्थात ऋतुओं के अनुसार हमे अपना जीवन कैसे जीना चाहिए – ऋतुचर्या है. अगर हम ऋतुचर्या का ध्यान रखें तो हमारा जीवन स्वास्थ्य होगा अन्यथा हमारा स्वास्थ्य ख़राब रहेगा और हम जीवन का आनंद नहीं ले पाएंगे.

आयुर्वेद के अनुसार कुल ६ ऋतुएं हैं. प्र्यत्येक ऋतू २ मास या २ महीनों की होती है.

उत्तरायण – आदान काल

इस ऋतू में मनुष्य का बल कम होता है और अग्नि प्रधान होती है. सूर्य और वायु प्रबल होने के कारण पृथ्वी की शीतलता को हर लेते हैं. वसंत ऋतू में तिक्त, कटु और कषाय रस का सेवन करें. ग्रीष्म ऋतू में विशेष कर मधुर रस का सेवन करें.

  • शिशिर ऋतू – माघ-फाल्गुन – मध्य जनवरी से मध्य मार्च – ये सर्दी का मौसम है और इसमें ओस पड़ती है. इस ऋतू में हेमंत ऋतू की तरह ही बल उत्तम होता है, जठराग्नि भी तीव्र होती है और व्यायाम आदि के पश्यात भोजन करें. इस ऋतू में मांस आदि का सेवन करें.
  • वसंत ऋतू – चैत्र-वैशाख – मध्य मार्च से मध्य मई – स्प्रिंग सीजन या वसंत. वसंत ऋतू में कफ सूर्य की वजह से पिघलने लगता है और जठराग्नि भी मंद पद जाती है. इस स्थिति में कफ को संयमित करना आवश्यक हो जाता है. इसे वमन और नस्य की सहयता से किया जा सकता है. भोजन हल्का और सुपाच्य होना चाहिए. व्यायाम आदि भी कम करना चाहिए. एक वर्ष पुराने गेहूँ, बाजरा एवं शहद का सेवन करना चाहिए. रेगिस्थान जैसे प्रदेश के प्राणियों का मास खाया जा सकता है जिसे अग्नि पर भुना गया हो. इस ऋतू में आम के रस का भी सेवन करना चाहिए, मित्रों के साथ और प्रेमिका द्वारा परोसा गया. आसव, अरिष्ट, सिधु, मर्द्विका या जल के साथ शहद का भी सेवन किया जाना चाहिए. इस ऋतू में दिन में सोना नहीं चाहिए और हलके और सुपाच्य भोजन करना चाहिए.
  • ग्रीष्म ऋतू – जयेष्ट-अषाढ़ – मध्य मई से मध्य जुलाई – गर्मी का मौसम. ग्रीष्म ऋतू में कफ घाट जाता है और वात बढ़ जाता है. इसमें लवण, कषाय तथा अम्ल रस का सेवन नहीं करना चाहिए. व्यायाम आदि भी कम करना चाहिए. सूर्य की तीव्र रौशनी से बचना चाहिए. भोजन मधुर रस प्रधान और हल्का होना चाहिए. मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए और अगर आवश्यक हो तो जल मिला के लेना चाहिए. अधिक मदिरापान से परेशानियाँ बढ़ सकती हैं. सफ़ेद उबले हुए चावल, रेगिस्थान के प्राणियों के मांस के साथ खाए जा सकते हैं. छाछ आदि का सेवन भी किया जा सकता है.

दक्षिणायन – विसर्ग काल

इस ऋतू में मनुष्य का बल उत्तम होता है और इसमें जल तत्व प्रधान होता है. इस ऋतू में वर्षा, शीतल वायु और बादलों के कारण पृथ्वी शीतल हो जाती है. इस ऋतू में चंद्रमा प्रधान होता है. इस ऋतू में मधुर, अम्ल और लवण रसों का सेवन करें.

  • वर्षा ऋतू – श्रावण-भाद्रपद – मध्य जुलाई से मध्य सितम्बर – बारिश का मौसम. वर्षा ऋतू में जठराग्नि और भी मंद हो जाती है. तीनो दोष इस ऋतू में असंतुलित हो जाते हैं और कई साड़ी बिमारियों को उत्पन्न करते हैं. इस ऋतू में दोषों के असंतुलन को कम करने के उपाय किये जाने चाहिए और जठराग्नि को भी तीव्र करने के प्रयास करने चाहिए. पुराने अनाज का सेवन करना चाहिए और मांस रस और शुष्क प्रदेशों के प्राणियों का मांस एवं हलके और सुपाच्य भोजन का सेवन करना चाहिए. वर्षा का जल, या गहरे कुओं का जल या उबाल कर ठंढा किया हुआ जल ही प्रयोग करना चाहिए. जिस दिन सूर्य की रौशनी ना हो, हल्का भोजन करना चाहिए. ज्यादा शारीरिक श्रम नहीं करना चाहिए और घरों के उपरी मंजिलों पर रहना चाहिए.
  • शरत ऋतू – अश्विन-कार्तिक – मध्य सितम्बर से मध्य नवेम्बर – ऑटम सीजन या शरत. शरद ऋतू में पित्त प्रधान होता है और शारीर की गर्मी बढ़ने लगती है. इसलिए इस ऋतू में आप गाय के घी का इस्तेमाल ज्यादा कर सकते है, चावल और गेहूँ भी खा सकते है. मांस , दही का, और जिस भोज्य पदार्थ में सोडा पड़ता है, उसका सेवन नहीं करना चाहिए. ज्यादा धुप में ना घूमें. और दोपहर को सोना नहीं चाहिए.
  • हेमंत ऋतू – मार्गशीर्ष-पौष – मध्य नवम्बर से मध्य जनवरी – सर्दी का मौसम इस ऋतू में मनुष्य का बल उत्तम होता है. जठराग्नि प्रबल होती है तथा मधुर, कषाय तथा लवण सासों का सेवन करें. रातें लम्बी होने के कारण सुबह भूक अच्छी लगती है. तेल मालिश और व्यायाम आदि के पश्च्यात स्नानादि से निवृत हो कर भोजन करना चाहिए.
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Benefits Of Amla

Amla is also known as Indian Gooseberry. It is a super-food and contains a wide variety of nutrients. Amla is a rich source of vitamin ‘C’. It also contains vitamins AB complex and potassium, calcium, magnesium, iron, carbohydrates, fiber and also diuretic acid. Because of these qualities, amla is considered as beneficial for many ailments. In traditional Ayurveda medicine it is used widely for many diseases. 

 Good For Diabetes

If you are a diabetic, amla can help you in regulating your blood sugar because it contains chromium, which helps in production of insulin.  

Amla Is Good For Heart

Amla has chromium which helps in reducing the effect of beta blockers and helps in maintaining heart health. Amla also helps to reduce the bad cholesterol and increase the good cholesterol. 

Good For Digestion

Amla is good for digestion and helps relieve symptoms of gas, acidity and even constipation.

Amla Helps In Weight Loss

Amla is good for digestion and also boosts metabolism. With a strong metabolism, you tend to burn extra calories which helps in losing weight. 

Amla Helps Fight Infections

Amla helps in fighting bacterial and fungal infections. It also boosts the immunity. Amla helps in detoxifying the body. Amla also helps in common cold, cough, ulcers and stomach infection. 

 Good For Bones

Amla is a good source of calcium and is good for bones and also helps in joint pain and other conditions. 

Amla Slows Ageing 

As Amla is full of antioxidants, it slows down the ageing process. 

High In Digestive Fiber

Amla is a rich source of digestive fiber. It also has anti-inflammatory properties. Fiber is essential for secretion of digestive and gastric juices and also helps the bowel movements.  Amla is, therefore, good for the entire digestive system. 

These are some of the many benefits of Amla. Making Amla a daily diet in any form like Amla fruit, candy, juice or even Amla churn will help you live a healthy life! 

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आयुर्वेद के अनुसार दिनचर्या

आयुर्वेद के अनुसार दिनचर्या

दिनचर्या शब्द का अर्थ है – आहार विहार तथा आचरण विधि. दिनचर्या में ही रात्रिचर्या और ऋतुचर्या भी समाहित हैं. आयुर्वेद सबसे पहले ये बताता है की स्वास्थ लोग अपने स्वास्थ्य की किस प्रकार रक्षा करें. इसमें वर्णित निर्देशों के पालन करने से आप का जीवन स्वास्थ और सुखमय हो जायेगा. 

ब्रह्ममुहूर्त में जागना

रात्रि के अंतिम प्रहर की दो घडी को ब्रह्ममुहूर्त कहा गया है. स्त्री-पुरुष के लिए इस समय जागना स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना गया है. ये नियम केवल स्वास्थ स्त्री-पुरुषों के लिए है. उठते ही ये विचार करे की मै उठने योग्य हूँ या नहीं और फिर यदि अपने को दिनचर्या के उपयुक्त समझे तब सौचविधि (मल-मूत्र आदि से निवृत होकर) करने के पश्चात अर्क, बरगद, ख़ैर या बाबुल आदि पेड़ों की एक पतली शाखा से दातोन करें.  दतवन करने के दो समय होते हैं – १. प्रातः काल और २. भोजन करने के पश्च्यात.

दतवन के अगले भाग को चबा कर अथवा कूट कर मुलायम कर लें अन्यथा इससे मसूड़ों में खरोंच या चोट लग सकती है. दतवन का रस कसैला (ख़ैर या बबूल), या कटु (तेजबल या तिमुर जैसा) या तिक्त (नीम जैसा) होना चाहिए. दतवन इस प्रकार करें की मसूड़ों को चोट ना लगे. 

आजकल अनेक प्रकार के चूर्ण, मंजन या पेस्ट आदि का भी चलन है. इनका प्रयोग भी आप सुविधा अनुसार कर सकते हैं. दतवन करने से मुख स्वच्छ रहता है. टूथ ब्रश के प्रयोग से पहले देख लें की वह मुलायम हो और मसूड़ों को नुक्सान न करे. 

दतवन के बाद जीभ को भी साफ़ कर लें. 

कुछ रोगों में दतवन का निषेध है जैसे मुख का लकवा, मुखपाक रोग आदि. 

अंजन प्रयोग

मुख शुद्धि के बाद आँखों के लिए अंजन का प्रयोग करें. सुवीर (सिन्धु) देश में प्राप्त होने वाला ये अंजन आँखों के लिए हितकर होता है. स्वास्थ आँखों में प्रतिदिन लगाने वाले अंजन को प्रत्यंजन तथा इसे सफ़ेद सुरमा भी कहते हैं. यह काले सुरमे के मुकाबले अधिक सौम्य होता है. आँखों से कफदोश को निकलने के लिए सप्ताह में एक बार रसांजन का प्रयोग भी करना चाहिए. 

अंजन प्रयोग के बाद, नस्य, गंदूश (कुल्ली, gargle), धुम्रपान, ताम्बुल आदि का सेवन करें. अगर आप अधिक भोजन करना चाहते हैं, मुख को स्वच्छ और सुगन्धित रखना चाहते हैं तो अच्छी तरह धो कर पान खाना चाहिए. पान के आगे और डंठल के भाग को काट देना चाहिए. पान को मुख में रखकर तत्काल निगलना नहीं चाहिए. पान में प्रयोग किये जाने वाले मसाले इस प्रकार हैं – जावित्री, जायफल, लौंग, कपूर, पिपरमिंट, कंकोल (शीतल चीनी), कटुक (लताकस्तुरी के बीज), तथा इसमें भिगाए हुए सुपारी के टुकड़े भी रखें. पान का सेवन सोकर उठने के बाद, भोजन के बाद और वमन के बाद नहीं करना चाहिए. एक बार में अधिक से अधिक दो बीड़ा पान लें जिसमे चुना और कत्था लगा हो. 

अभ्यंग सेवन विधान 

अभ्यंग (मालिश) प्रतिदिन करना या करना चाहिए. अभ्यंग से जरा (बुढ़ापा), थकान तथा वात रोगों में लाभ होता है. ये दृष्टि को स्वच्छ करता है, शारीर को पुष्ट करता है, आयु को बढ़ता है, गहरी नींद लता है, त्वचा रोगों में लाभ करता है तथा मांसपेशियों को भी पुष्ट करता है. मालिश के लिए घी से अधिक तेल लाभदायक होते है. अभ्यंग पुरे शारीर में करना चाहिए तथा सर, कानो तथा पैरों के तलुवों में विशेष रूप से करना चाहिए. 

रोगी लोगों को अभ्यंग करने से पहले चिकित्सक की सलाह ले लेनी चाहिए. 

व्यायाम का विधान 

शारीर की कोई भी चेष्टा (कर्म) जो स्थिरता बढाती हो, मन को सुखकर लगे और बल वृद्धि करे उसे ही व्यायाम कहते हैं. व्यायाम मात्र के अनुसार करना चाहिए. बालकों को एवम वृद्धों को व्यायाम नहीं करना चाहिए. व्यायाम करने से कार्य करने की क्षमता बढती है, जठराग्नि तेज होती है, मोटापा घटता है और अन्य बहुत से लाभ होते हैं. 

बलवान तथा स्निग्ध (घी-तेल आदि में बने हुए या बादाम आदि) पधार्थो का सेवन करने वाले मनुष्यों को शीत तथा वसंत ऋतू में आधी शक्ति व्यायाम करना चाहिए ठाठ इससे अन्य ऋतुओं में और भी कम व्यायाम करना चाहिए. व्यायाम करते हुए जब आप हांफने लगें और आपको पसीना आने लगे और मुख सूखने लगे तो समझना चाहिए की आधी शक्ति समाप्त हो गई और व्यायाम समाप्त कर देना चाहिए. व्यायाम करने के बाद सभी अंगों का मर्दन करना चाहिए. 

अधिक व्यायाम करने से शारीर को हानि होती है. व्यायाम करने के बाद उबटन करना चाहिए. जौ या चने के आटे में तेल और हल्दी मिला कर शारीर पर मसलने को उबटन कहते हैं. इससे रोम छिद्रों से मैल निकल जाता है तथा त्वचा मुलायम हो जाती है. 

स्नान के गुण 

स्नान करने से जठराग्नि बढती है, स्नान वीर्यवर्धक होता, उत्साहवर्धक तथा बल बढ़ता है. स्नान खुजली, पसीना, मल आदि का नाश करता है. गर्दन से नीचे के शारीर का गर्म जल से स्नान करने से बल बढ़ता है और अगर इसी गर्म जल से सर को धोएं तो यह बालों को नुक्सान करता है तथा आँखों की रौशनी कम होती है. 

अर्दित (मुख प्रदेश का लकवा), नेत्र रोग, कर्ण रोग, मुख रोग, अतिसार, अफरा तथा भोजन के बाद स्नान नहीं करना चाहिए. 

भोजन आदि कर्तव्य 

स्नान करने के बाद और पहले किये हुआ भोजन के पच जाने के बाद, जो हितकर भोजन हो, मात्रा के अनुसार भोजन करें. मूत्र-पुरीष के वेगों को बलपूर्वक ना उभाड़ें. यदि मल-मूत्र का वेग मालुम पड़े तो उसे दबा कर किसी अन्य कार्यों में ना लगें. साथ ही यदि कोई साध्य रोग हो तो सर्वप्रथम उसकी चिकित्सा करें. 

हितकर वह भोजन है जो धारण एवं पोषण करे. 

सुख का साधन धर्म 

अच्छे कर्म करना धर्म है और बुरे कर्म करना अधर्म है. अच्छे कर्म या धर्म ही सुख का साधन है. 

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रोग तथा आरोग्य के कारण

rog tatha aarogy ke karan

काल अर्थात समय या मौसम, अर्थ – जिसे ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकता है और कर्म – मन, वाणी और शारीर की प्रवृति या चेष्टा – इन तीनो के हीन योग, अति योग और मिथ्या योग से ही रोगों की उत्पत्ति होती है. इन तीनो का सम्यक योग स्वास्थ रहने का कारण है. 

आयुर्वेद की दृष्टि में काल तीन प्रकार का है इसे आप मौसम भी कह सकते है – शीत काल, उष्ण काल और वर्षा काल. इन्ही कालों के समूह को वर्ष, वत्सर या संवत्सर भी कहते हैं. शीत, उष्ण और वर्षा का अधिक होना अतियोग है, कम होना हीनयोग है और अपनी सीमा के विपरीत होना मिथ्यायोग है. 

जिन विषयों को आप अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ग्रहण कर सकते हैं वाही अर्थ है. अर्थों का इन्द्रियों के साथ अधिक संयोग अतियोग है, कम संयोग होना हीनयोग है और अनिष्टकारी संयोग होना मिथ्या योग है. 

शारीर, मन और वाणी के प्रयास को कर्म कहते है. अधिक कर्म अतियोग है, कर्म की कमी हीनयोग है और हानिकारक कर्म को अनिष्टयोग कहते हैं. 

किसी भी रोग की उत्पत्ति का कारण काल, अर्थ और कर्म का अधिक, कम या अनिष्टकारी होना है. इसके आलावा जो समुचित योग है उसे सम्यग्योग कहा गया है. सम्यग्योग आरोग्य का या स्वास्थ्य का आधार है. 

रोग और आरोग्य में भेद 

जब वात, पित्त और कफ सम न होकर विषम अवस्था में हों तो ये रोग उत्पन्न करता है और जब ये सामान अवस्था में हों तो शारीर स्वास्थ रहता है.  रोग दो प्रकार के हो सकते हैं – १. जो वात, पित्त और कफ की विषमता से हो – ये निजी या आंतरिक रोग के जाते हैं. २. अभिघात या किसी भी बाहरी कारणों से होने वाले रोगों को आगंतुज़ कहा गया है. रोगों के दो आश्रयस्थान हैं – काय या शारीर और मन. ज्वर, रक्तपित्त, कास, स्वास आदि काय रोग हैं और मद, मूरछा, सन्यास, राग-द्वेष आदि मानसिक रोग हैं.

मानस या मन के दो दोष हैं – रजोगुण और तमोगुण. ये दोनों गुण एक साथ ही रहते हैं. सत्वगुण निर्विकार है और मानसिक स्वास्थ का कारण है. सत्वं = अस्तित्व युक्त. राजस = राग या आसक्ति युक्त और तामस = विनाशकारक प्रधान गुण होता है. 

देखकर, हाथ से छुकर और रोग के विषय में अलग-अलग प्रश्न पूछ कर रोगी की परीक्षा की जा सकती है. रोगी की परीक्षा में आधुनिक उपकरणों का भी प्रयोग किया जा सकता है. रोगज्ञान के उपाय – निदान, लक्षण, पूर्वरूप, उपशय तथा संप्राप्ति से रोग की परीक्षा की जानी चाहिए. 

देश्भेदों का वर्णन 

आयुर्वेद में – भूमिदेश और देह्देश – ये दो प्रकारों के देश का वर्णन है. शारीर के विभिन्न अवयवों को देह्देश कहा गया है. भूमि देश तीन प्रकार के हैं – जंगल देश – यहाँ हवा अधिक चलती है. आनुप देश यहाँ कफ दोष प्रधान होता है और साधारण प्रदेश – इस देश में तीनो दोष सामान अवस्था में रहते हैं. जंगल देश में पित्तज, रक्तज और वातज रोग अधिक होते है. ये प्रदेश सूखे प्रदेश हैं जैसे बीकानेर, जैसलमेर आदि. आनुप देश में जल पहाड़ आदि अधिक होते हैं और यहाँ कफज और वातज रोग अधिक होते हैं. साधारण प्रदेश में तीनो दोष समुचित मात्र में होने के कारण यहाँ के निवासी अधिक स्वास्थ होते हैं जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि. 

काल के भेद

आयुर्वेद में काल दो प्रकार का है – १. क्षण – प्रातः काल और सायं काल. २. रोग की अवस्था (आमावस्था और जीर्णावस्था). इन दोनों के अनुसार ही चिकित्सा की जानी चाहिए. 

औषध के भेद 

१. वामन-विरेचन आदि विधियों से रोग को निकलना शोधन कहलाता है और २. बढे हुए दोषों को शांत करने को शमन कहते हैं. वात दोष की चिकत्सा में बस्ती-प्रयोग, पित्त दोष की चिकत्सा में विरेचन प्रयोग और कफ दोष की चिकत्सा में वमन-प्रयोग है. वात दोष में तैल, पित्त दोष में घृत और कफ दोष में मधु का प्रयोग उचित शमन चिकत्सा है. 

बुद्धि तथा धैर्य से व्यवहार करना और आत्मादी विज्ञान ( कौन मेरा है, क्या मेरा बल है आदि) का विचार कार्य करना मानसिक दोषों की उत्तम चिकत्सा है. 

चिकित्सा के चार पाद 

  1. वैध्य या चिकत्सक – चिकत्सक को कुशल, ज्ञानी, जिसने चिकत्सा की विधियों को अनेक बार परखा हो और शारीर तथा आचरण से पवित्र होना चाहिए.
  2. द्रव्य या औषधि – औषधि ऐसी हो जो कई रूपों में दी जा सके, जो औषधि के सभी गुणों से परिपूर्ण हो, गुणों की संपत्ति से संपन्न हो और रोगी, देश-काल के अनुरूप हो. 
  3. परिचारक – रोगी से स्नेह रखने वाला, शुद्ध या साफ़-सुथरा हो, कुशल हो और बुद्धिमान हो. 
  4. रोगी – रोगी के पास धन आदि हो, चिकत्सक के परामर्श के अनुसार आचरण करने वाला हो, अपने सुख-दुःख कह सके और चिकत्सा काल के कष्टों से ना घबराये, ऐसा हो. 

चिकत्सा के चार पादों में चिकत्सक प्रधान होता है. बाल रोगी अपने बात को ठीक प्रकार से कह नहीं सकता इसलिए चिकत्सक को उसे समझना चाहिए. 

रोगों के भेद 

  1. साध्य – १. सुख साध्य और २. कष्ट साध्य. 
  2. असाध्य – १. कुछ दिन चिकत्सा द्वारा चलने योग्य और २. जवाब देकर चिकत्सा करने योग्य. 
  3. जो रोग उचित चिकत्सा करने से और पथ्य सेवन करते रहने से शांत रहते है उन्हें याप्य रोग कहा जाता है.