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आयुर्वेद के अनुसार दिनचर्या

आयुर्वेद के अनुसार दिनचर्या

दिनचर्या शब्द का अर्थ है – आहार विहार तथा आचरण विधि. दिनचर्या में ही रात्रिचर्या और ऋतुचर्या भी समाहित हैं. आयुर्वेद सबसे पहले ये बताता है की स्वास्थ लोग अपने स्वास्थ्य की किस प्रकार रक्षा करें. इसमें वर्णित निर्देशों के पालन करने से आप का जीवन स्वास्थ और सुखमय हो जायेगा. 

ब्रह्ममुहूर्त में जागना

रात्रि के अंतिम प्रहर की दो घडी को ब्रह्ममुहूर्त कहा गया है. स्त्री-पुरुष के लिए इस समय जागना स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना गया है. ये नियम केवल स्वास्थ स्त्री-पुरुषों के लिए है. उठते ही ये विचार करे की मै उठने योग्य हूँ या नहीं और फिर यदि अपने को दिनचर्या के उपयुक्त समझे तब सौचविधि (मल-मूत्र आदि से निवृत होकर) करने के पश्चात अर्क, बरगद, ख़ैर या बाबुल आदि पेड़ों की एक पतली शाखा से दातोन करें.  दतवन करने के दो समय होते हैं – १. प्रातः काल और २. भोजन करने के पश्च्यात.

दतवन के अगले भाग को चबा कर अथवा कूट कर मुलायम कर लें अन्यथा इससे मसूड़ों में खरोंच या चोट लग सकती है. दतवन का रस कसैला (ख़ैर या बबूल), या कटु (तेजबल या तिमुर जैसा) या तिक्त (नीम जैसा) होना चाहिए. दतवन इस प्रकार करें की मसूड़ों को चोट ना लगे. 

आजकल अनेक प्रकार के चूर्ण, मंजन या पेस्ट आदि का भी चलन है. इनका प्रयोग भी आप सुविधा अनुसार कर सकते हैं. दतवन करने से मुख स्वच्छ रहता है. टूथ ब्रश के प्रयोग से पहले देख लें की वह मुलायम हो और मसूड़ों को नुक्सान न करे. 

दतवन के बाद जीभ को भी साफ़ कर लें. 

कुछ रोगों में दतवन का निषेध है जैसे मुख का लकवा, मुखपाक रोग आदि. 

अंजन प्रयोग

मुख शुद्धि के बाद आँखों के लिए अंजन का प्रयोग करें. सुवीर (सिन्धु) देश में प्राप्त होने वाला ये अंजन आँखों के लिए हितकर होता है. स्वास्थ आँखों में प्रतिदिन लगाने वाले अंजन को प्रत्यंजन तथा इसे सफ़ेद सुरमा भी कहते हैं. यह काले सुरमे के मुकाबले अधिक सौम्य होता है. आँखों से कफदोश को निकलने के लिए सप्ताह में एक बार रसांजन का प्रयोग भी करना चाहिए. 

अंजन प्रयोग के बाद, नस्य, गंदूश (कुल्ली, gargle), धुम्रपान, ताम्बुल आदि का सेवन करें. अगर आप अधिक भोजन करना चाहते हैं, मुख को स्वच्छ और सुगन्धित रखना चाहते हैं तो अच्छी तरह धो कर पान खाना चाहिए. पान के आगे और डंठल के भाग को काट देना चाहिए. पान को मुख में रखकर तत्काल निगलना नहीं चाहिए. पान में प्रयोग किये जाने वाले मसाले इस प्रकार हैं – जावित्री, जायफल, लौंग, कपूर, पिपरमिंट, कंकोल (शीतल चीनी), कटुक (लताकस्तुरी के बीज), तथा इसमें भिगाए हुए सुपारी के टुकड़े भी रखें. पान का सेवन सोकर उठने के बाद, भोजन के बाद और वमन के बाद नहीं करना चाहिए. एक बार में अधिक से अधिक दो बीड़ा पान लें जिसमे चुना और कत्था लगा हो. 

अभ्यंग सेवन विधान 

अभ्यंग (मालिश) प्रतिदिन करना या करना चाहिए. अभ्यंग से जरा (बुढ़ापा), थकान तथा वात रोगों में लाभ होता है. ये दृष्टि को स्वच्छ करता है, शारीर को पुष्ट करता है, आयु को बढ़ता है, गहरी नींद लता है, त्वचा रोगों में लाभ करता है तथा मांसपेशियों को भी पुष्ट करता है. मालिश के लिए घी से अधिक तेल लाभदायक होते है. अभ्यंग पुरे शारीर में करना चाहिए तथा सर, कानो तथा पैरों के तलुवों में विशेष रूप से करना चाहिए. 

रोगी लोगों को अभ्यंग करने से पहले चिकित्सक की सलाह ले लेनी चाहिए. 

व्यायाम का विधान 

शारीर की कोई भी चेष्टा (कर्म) जो स्थिरता बढाती हो, मन को सुखकर लगे और बल वृद्धि करे उसे ही व्यायाम कहते हैं. व्यायाम मात्र के अनुसार करना चाहिए. बालकों को एवम वृद्धों को व्यायाम नहीं करना चाहिए. व्यायाम करने से कार्य करने की क्षमता बढती है, जठराग्नि तेज होती है, मोटापा घटता है और अन्य बहुत से लाभ होते हैं. 

बलवान तथा स्निग्ध (घी-तेल आदि में बने हुए या बादाम आदि) पधार्थो का सेवन करने वाले मनुष्यों को शीत तथा वसंत ऋतू में आधी शक्ति व्यायाम करना चाहिए ठाठ इससे अन्य ऋतुओं में और भी कम व्यायाम करना चाहिए. व्यायाम करते हुए जब आप हांफने लगें और आपको पसीना आने लगे और मुख सूखने लगे तो समझना चाहिए की आधी शक्ति समाप्त हो गई और व्यायाम समाप्त कर देना चाहिए. व्यायाम करने के बाद सभी अंगों का मर्दन करना चाहिए. 

अधिक व्यायाम करने से शारीर को हानि होती है. व्यायाम करने के बाद उबटन करना चाहिए. जौ या चने के आटे में तेल और हल्दी मिला कर शारीर पर मसलने को उबटन कहते हैं. इससे रोम छिद्रों से मैल निकल जाता है तथा त्वचा मुलायम हो जाती है. 

स्नान के गुण 

स्नान करने से जठराग्नि बढती है, स्नान वीर्यवर्धक होता, उत्साहवर्धक तथा बल बढ़ता है. स्नान खुजली, पसीना, मल आदि का नाश करता है. गर्दन से नीचे के शारीर का गर्म जल से स्नान करने से बल बढ़ता है और अगर इसी गर्म जल से सर को धोएं तो यह बालों को नुक्सान करता है तथा आँखों की रौशनी कम होती है. 

अर्दित (मुख प्रदेश का लकवा), नेत्र रोग, कर्ण रोग, मुख रोग, अतिसार, अफरा तथा भोजन के बाद स्नान नहीं करना चाहिए. 

भोजन आदि कर्तव्य 

स्नान करने के बाद और पहले किये हुआ भोजन के पच जाने के बाद, जो हितकर भोजन हो, मात्रा के अनुसार भोजन करें. मूत्र-पुरीष के वेगों को बलपूर्वक ना उभाड़ें. यदि मल-मूत्र का वेग मालुम पड़े तो उसे दबा कर किसी अन्य कार्यों में ना लगें. साथ ही यदि कोई साध्य रोग हो तो सर्वप्रथम उसकी चिकित्सा करें. 

हितकर वह भोजन है जो धारण एवं पोषण करे. 

सुख का साधन धर्म 

अच्छे कर्म करना धर्म है और बुरे कर्म करना अधर्म है. अच्छे कर्म या धर्म ही सुख का साधन है.